एसआईआर में नागरिकता की सीमित जांच कर सकता है आयोग : सुप्रीम कोर्ट
सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि निर्वाचन आयोग मतदाता सूची बनाते या संशोधित करते समय नागरिकता की सीमित जांच कर सकता है, लेकिन किसी की नागरिकता पर अंतिम फैसला नहीं दे सकता।
सुप्रीम कोर्ट ने 27 मई को कहा कि निर्वाचन आयोग (ईसीआई) मतदाता सूची तैयार करने और उसमें संशोधन करने के दौरान नागरिकता की स्थिति की सीमित जांच कर सकता है। हालांकि, शीर्ष अदालत ने स्पष्ट किया कि आयोग किसी व्यक्ति की नागरिकता पर अंतिम निर्णय नहीं ले सकता।
अदालत ने कहा कि किसी व्यक्ति की नागरिकता तय करने का अधिकार केवल केंद्र सरकार के संबंधित सक्षम अधिकारियों के पास है।
नागरिकता को लेकर यह टिप्पणी मुख्य न्यायाधीश (सीजेआई) सूर्य कांत की अध्यक्षता वाली पीठ ने उस महत्वपूर्ण फैसले में की, जिसमें निर्वाचन आयोग को मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) और संशोधन करने का अधिकार सही माना गया।
पीठ ने कहा कि निर्वाचन आयोग को केवल इस सीमित उद्देश्य के लिए नागरिकता की जांच करने का अधिकार है कि कोई व्यक्ति मतदाता सूची में शामिल होने के योग्य है या नहीं।
फैसले में कहा गया कि जन प्रतिनिधित्व कानून की धारा 16 के तहत निर्वाचन आयोग को मतदाता सूची तैयार करने या संशोधित करने के दौरान नागरिकता से जुड़े प्रश्नों की जांच करने का अधिकार है।
हालांकि, यह जांच केवल इस उद्देश्य से की जा सकती है कि किसी व्यक्ति का नाम मतदाता सूची में शामिल किया जाए या हटाया जाए।
अदालत ने यह भी कहा कि ऐसे मतदाता के पक्ष में मौजूद कानूनी धारणा का ध्यान रखना होगा, जिसका नाम पहले से मतदाता सूची में दर्ज है।
फैसले के अनुसार, इसी सीमित कानूनी दायरे में निर्वाचन आयोग उपलब्ध सामग्री की जांच कर चुनाव संबंधी उद्देश्य से निर्णय ले सकता है।
पीठ ने स्पष्ट किया कि पूरी प्रक्रिया न्यायिक समीक्षा के दायरे में रहेगी, ताकि यह सुनिश्चित किया जा सके कि जांच निष्पक्ष और कानून के अनुसार की गई है।
कोर्ट ने यह भी कहा कि मतदाता सूची से किसी का नाम हटाने का अर्थ यह नहीं है कि उसे कानूनी रूप से गैर-नागरिक घोषित कर दिया गया है।
अदालत ने कहा कि मतदाता सूची में नाम दर्ज होने से नागरिकता की एक कानूनी धारणा बनती है, लेकिन उचित जांच और कानूनी प्रक्रिया के जरिए इसे चुनौती दी जा सकती है।
लोगों को मतदान अधिकार से वंचित होने से बचाने के लिए सुप्रीम कोर्ट ने निर्वाचन आयोग को निर्देश दिया कि नागरिकता के आधार पर जिन लोगों के नाम हटाए जाएं, उनके मामलों को चार सप्ताह के भीतर नागरिकता कानून के तहत सक्षम प्राधिकारी के पास भेजा जाए।



