स्वदेशी डीएमई गैस से खत्म होगी एलपीजी आयात पर देश की निर्भरता
भारत दुनिया का तीसरा सबसे बड़ा ऊर्जा उपभोक्ता और गैस खपत के मामले में चौथा सबसे बड़ा देश है। बड़ी बात यह है कि अपनी ऊर्जा जरूरतों को पूरा करने के लिए भारत काफी हद तक आयात पर निर्भर है, जिसके कारण भारी मात्रा में विदेशी मुद्रा खर्च करनी पड़ती है।
एलपीजी (LPG) की बात करें तो भारत अपनी कुल आवश्यकता का लगभग 60 प्रतिशत आयात करता है। इसमें से भी लगभग 85 से 90 प्रतिशत आपूर्ति खाड़ी देशों से होती है, जो होर्मुज स्ट्रेट के रास्ते भारत पहुंचती है।
पश्चिम एशिया में जारी संकट और होर्मुज स्ट्रेट में उत्पन्न बाधाओं के कारण ऊर्जा आपूर्ति पर गंभीर असर पड़ रहा है। ऐसे बढ़ते ऊर्जा संकट के बीच पुणे के वैज्ञानिकों ने उम्मीद की नई किरण दिखाई है।
वैज्ञानिकों ने डाई मिथाइल ईथर (DME) को एलपीजी के स्वदेशी और सस्ते विकल्प के रूप में प्रस्तुत किया है। इससे न केवल ऊर्जा संकट से राहत मिलेगी, बल्कि आयात पर निर्भरता कम होने से विदेशी मुद्रा की भी बड़ी बचत होगी।
प्रोजेक्ट से जुड़े वैज्ञानिक डॉ. टी. राजा के अनुसार, DME और LPG के उपयोग में काफी समानता है। इसे आसानी से प्रोपेन और ब्यूटेन के साथ मिलाकर घरेलू गैस या औद्योगिक ईंधन के रूप में इस्तेमाल किया जा सकता है।
शुरुआती चरण में 20 प्रतिशत DME और 80 प्रतिशत LPG के मिश्रण का उपयोग करने की योजना है। इसका सबसे बड़ा फायदा यह होगा कि लोगों को अपने मौजूदा गैस चूल्हे या सिलेंडर बदलने की जरूरत नहीं पड़ेगी।
वैज्ञानिकों का मानना है कि DME का उपयोग केवल रसोई गैस तक सीमित नहीं रहेगा। इसे एलपीजी से चलने वाले ऑटो रिक्शा के विकल्प के रूप में भी इस्तेमाल किया जा सकेगा। यानी यह तकनीक घरेलू उपयोग के साथ-साथ परिवहन क्षेत्र में भी बड़ा बदलाव ला सकती है।
रिपोर्ट के अनुसार यदि भारत घरेलू एलपीजी में 20 प्रतिशत DME ब्लेंडिंग शुरू करता है, तो हर साल लगभग 63 लाख टन एलपीजी आयात कम किया जा सकता है।
इससे भारत को हर साल लगभग 4.04 अरब डॉलर यानी करीब 34,200 करोड़ रुपये की विदेशी मुद्रा बचाने में मदद मिल सकती है।
यह उपलब्धि ऐसे समय में बेहद महत्वपूर्ण मानी जा रही है, जब पश्चिम एशिया में युद्ध और वैश्विक तनावों के कारण एलपीजी की सप्लाई और कीमतों पर लगातार दबाव बना हुआ है।