बंगाल में धर्म आधारित योजनाओं का अंत
18 मई को बंगाल की नव-निर्वाचित भाजपा सरकार ने सत्ता संभालते ही धर्म के आधार पर चल रही वित्तीय सहायता योजनाओं को बंद करने का निर्णय लिया। यह कदम राज्य की सियासत और अर्थव्यवस्था में दशकों से रहे तुष्टीकरण की राजनीति को बदलने वाला माना जा रहा है।
मुख्यमंत्री शुभेंदु अधिकारी की अध्यक्षता में हुई कैबिनेट बैठक में स्पष्ट किया गया कि नई सरकार वोट बैंक राजनीति को समाप्त करने के एजेंडे पर तेजी से आगे बढ़ रही है।
पूर्ववर्ती ममता बनर्जी सरकार द्वारा इमामों, मुअज्जिनों और पुजारियों के लिए चलाए गए मासिक भत्ते पूरी तरह रद्द कर दिए गए हैं। सरकार का संदेश है कि राज्य की संपत्ति का लाभ किसी विशेष धर्म के संरक्षकों को नहीं, बल्कि सभी आम नागरिकों को मिलना चाहिए।
नई सरकार ने यह भी स्पष्ट किया कि छात्रों की छात्रवृत्ति योजनाएं जारी रहेंगी। इसके अलावा, 1 जून से महिलाओं के लिए “अन्नपूर्णा भंडार” योजना शुरू की जाएगी, जिसमें पात्र महिलाओं के खातों में 3,000 रुपये मासिक राशि ट्रांसफर की जाएगी और मुफ्त सरकारी बस सेवा भी उपलब्ध होगी।
कर्मचारियों के लिए चुनाव में किए गए वादों को पूरा करते हुए कैबिनेट ने सातवें वेतन आयोग के गठन को हरी झंडी दी है। राज्य में छठे वेतन आयोग की अवधि 31 दिसंबर 2025 को समाप्त हो चुकी थी। लंबित महंगाई भत्ते पर निर्णय जल्द लिया जाएगा।
कलकत्ता हाई कोर्ट के 2024 के फैसले के आधार पर, नई सरकार ने ओबीसी सूची को रद्द और संशोधित करने का निर्णय लिया। तृणमूल सरकार के दौरान शामिल 77 समुदायों (जिसमें 75 मुस्लिम समुदाय शामिल थे) को अदालत ने अमान्य कर दिया था। अब राज्य में ओबीसी आरक्षण की पात्रता तय करने के लिए नई विशेषज्ञ समिति गठित की जाएगी।